विश्व में खाद्य समस्या एवं समस्या के कारण

विश्व में खाद्य समस्या एवं समस्या के कारण Food Problems of the World and Its reasons

Geography

विश्व में खाद्य समस्या एवं समस्या के कारण

भोजन मनुष्य की आधारभूत आवश्यकता है। भोजन से हमें वे तत्व मिलते हैं, जिसकी आवश्यकता शरीर को होती है इन आवश्यक तत्वों को ही पोषक तत्व कहते हैं 21वीं शताब्दी में विश्व ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी, दूरसंचार, परिवहन, कम्प्यूटर, विज्ञान आदि के क्षेत्र में चाहे जितनी उपलब्धियाँ अर्जित कर ली हों, किन्तु उसके 84 करोड़ जनसंख्या अभी भी भूखमरी के शिकार है भूख से तड़पते लोगों की अधिक संख्या विकासशील दुनियाँ में है खाद्यान्न की कमी और खाद्य पदार्थों में पोषक तत्वों की अनुपलब्धता से उत्पन्न कुपोषण की समस्या विश्व में विकासशील देशों में बनी हुई है विकासशील देशों के लिए यह एक गंभीर समस्या है। इसके अन्तर्गत लगभग विश्व के 130-140 देश शामिल हैं विश्व के विकासशील देशों में विश्व की 71.1% जनसंख्या निवास करती है, और इनमें से 50% जनसंख्या कुपोषण की समस्या से ग्रसित हैं कृषि उत्पादों में महत्वपूर्ण वृद्वि होने के बावजूद 1 अरब से अधिक लोग अर्थात् प्रत्येक छः व्यक्तियों में से एक व्यक्ति अति भूख तथा कुपोषण से ग्रसित है

खाद्य समस्या (Food Problems)

विश्व के सभी मनुष्य को भोजन उपलब्ध होना ही खाद्य समस्या कहलाता है। विश्व में यह समस्या अधिकतर विकासशील देशों में ही पाई जाती है

स्थिति समीक्षा (Situation Review) विश्व में खाद्य स्थिति समीक्षा के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य:

  1. संसार में खाद्य की आपूर्ति का वितरण असमान है ।
  2. विश्व के कुछ ही प्रदेशों, जैसे उत्तर अमेरिका, पश्चिम यूरोप, तथा आस्ट्रेलिया में आवश्यकता से अधिक खाद्यान्न का उत्पादन होता है ।
  3. ये विकसित प्रदेश अपना खाद्यान्न विश्व बाजार मूल्य पर बेचते हैं ।
  4. गरीब विकासशील देशों के लिए इस मूल्य पर अन्न खरीदना सामर्थ्य से बाहर है ।
  5. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में आने वाले खाद्यान्न का एक बहुत छोटा भाग ही खाद्य सहायता के रूप में प्रदान किया जाता है । उदाहरण के लिए 1980 के दशक में जब उप-सहारीय अफ्रीका अकालग्रस्त था, तब संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपने राजनीतिक सहयोगी मध्य अमेरिकी देशों को सम्पूर्ण अकाल ग्रस्त अफ्रीका की तुलना में चार गुना अधिक खाद्यान्न भेजा था ।
  6. खाद्यान्न-भंडारण का प्रयोग बहुधा, खाद्य सुरक्षा के माप के रूप में किया जाता है। आज से लगभग 50 वर्ष पहले जीविकोपार्जन कृषि अर्थव्यवस्थाओं में चावल तथा गेहूँ की उन्नत किस्मों के प्रयोग के बाद से खाद्य उत्पादन में तीव्र वृद्धि हुई । इसने हरित क्रांति को जन्म दिया । परन्तु अब यह गति धीमी हो रही है ।
  7. 1950 से 1990 के बीच विश्व खाद्यान्न में हो रही 2 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि की तुलना में 1990 के बाद इसमें मात्र लगभग 0.5% की वृद्धि ही देखी जा रही है । परिणामस्वरूप खाद्यान्न भंडारण में ह्रास हुआ है।
  8. इसलिए अब खाद्यान्न उत्पादन के सतत् पोषण (टिकाऊ) की क्षमता में सुधार और खाद्य सुरक्षा में वृद्धि के लिए नई रणनीतियाँ बनाने की आवश्यकता है ।
  9. इस बात की संभावना अधिक है कि खाद्यान्नोत्पादन के विस्तार के सबसे बड़े संभाव्य क्षेत्र वही होंगे जो अभी भी ‘संसार के अन्न भंडार’ और ‘रोटी की टोकरी’ के नाम से प्रसिद्ध है ।
  10. वर्तमान में पौधों की उन्नत किस्म विकसित करने में लगे वैज्ञानिक लम्बे समय से उपेक्षित बीज बैंको के आनुवांशिक संसाधनों का शोषण कर रहे हैं ।
  11. नई रणनीतियों में भी सीमित संसाधनों के दक्षतापूर्ण प्रयोग के साथ-साथ परम्परागत अंतर्फसली विधि जिससे सैकड़ो वर्षो तक भूमि की उत्पादकता को यथावत बनाए रखा जाए इस विधि को अपनाने पर विशष बल दिया गया है ।
  12. कुछ निश्चित फसलों को साथ उगाने से मृदा की उर्वरता में वृद्धि, मृदा अपरदन का नियंत्रण तथा फसल की उपज में वृद्धि होती है ।
  13. स्थानांतरी कृषि के क्षेत्रों में कृषि वानिकी तथा पोषकों के पुनर्चक्रण से मृदा की उत्पादकता में वृद्धि हुई है । है 14. उच्च उपज प्रदान करने वाली अम्ल सहनीय चावल तथा नाइट्रोजन प्रगाढ़ी कपास की कई किस्मों को उर्वरकों, चूना अथवा जोताई के बिना चक्र के रुप में उगाया जाता है ।
  14. हाल के वर्षों में ही आनुवांशिक अभियांत्रिकी ने पौधों तथा पशुओं की आनुवांशिकी संरचना को क्रमबद्ध रूप से परिवर्तित कर दिया है ।

संसार में आज भी खाद्य समस्या की स्थिति बनी हुई है । विश्व के लाखों लोग खाद्य तथा कुपोषण ग्रसित है|

खाद्य समस्या के कारण (Reason of Food Problems)

  1. खाद्य पदार्थों का सीमित उत्पादन : खाद्य पदार्थों के उत्पादन की वृद्धि दर धीमी है, जिसके कारण ही विश्व में खाद्य समस्या की स्थिती बनी हुई है । विकासशील देशों में जनसंख्या अधिक है, परन्तु खाद्यान्न उत्पादन कम है फलतः वहाँ खाद्य संकट उत्पन्न हो जाता है।
  2. कम उत्पादकता : विश्व के विकसित देशों में खाद्यान्न उत्पादकता अधिक है जबकि विकासशील में अत्यधिक, फलतः इसी क्षेत्र में खाद्यान्न संकट की स्थिति आती है। विकासशील देशों में टेरोरोक्सा, चूना पत्थर, मृदा, जलोढ़ मृदा, काली मृदा सभी उपजाऊ है, परन्तु कृषि की तकनीकी नहीं उपलब्ध रहने के कारण खाद्यान्न उत्पादकता कम है ।
  3. कृषि उत्पादन में विविधता का अभाव : अधिकतर विकासशील देश कुछ ही खाद्य फसलों पर निर्भर करते हैं, जबकि विकसित देशों में विविधतायुक्त उत्पादन किया जाता है। अधिकतर विकसित देशों में परिष्कृत पदार्थ हरी सब्जी, फल-फूल भी उत्पन्न किए जाते हैं, जिसके कारण प्रोटीन, खनिज व विटामिन की पूर्ति खाद्य समस्या से पूर्ण हो जाती है ।
  4. वितरण सम्बन्धी समस्या : यह समस्या राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर है । अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य पदार्थों की राजनीति की जाती है, जबकि रास्ट्रीय स्तर में अनेक देशों में खाद्य पदार्थों की उपलब्धता होती ही नहीं है ।
  5. परिवहन एवं रख-रखाव सम्बन्धित समस्याएँ : एफ० ए० ओ० [FAO] खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार विश्व में 10% खाद्य पदार्थों की बरबादी परिवहन एवं रख-रखाव की समस्या के कारण होता है । विकासशील देशों में परिवहन सुविधाओं का अभाव है, भंडार गृह एवं शीत गृह का निर्माण नहीं हुआ है, जिससे हजारों टन खाद्यान्न की बर्बादी हो जाती है ।
  6. जानवरों व कीड़े-मकोड़ो द्वारा फसलों की बर्बादी : यह समस्या भी विश्व के विकासशील देशों को ही है । अफ्रीकी देशों में हाथी के झुण्ड फसलों को बर्बाद कर देते है। भारत एवं चीन में चूहों द्वारा फसलों की बरबादी होती है ।सहारा से लेकर राजस्थान मरुस्थल तक टिड्डी द्वारा फसलों की बर्बादी, एवं सूखे के कारण एवं सूक्ष्म जीवाणुओं के प्रभाव से फसल बर्बाद होते हैं। विकासशील देशों में कीटनाशक की पर्याप्त उपलब्धता न होने के कारण फसलों की बरबादी एक सामान्य समस्या है
  7. जनसंख्या दबाव एवं जनसंख्या वृद्धि : जनसंख्या दबाव के कारण कृषि में आधुनिकता एवं चकबन्दी पद्वति कायम नहीं हो पा रही है । यहाँ प्रति हेक्टेयर श्रमिक दबाव अधिक है । अतः सस्ते श्रमिक मिलने के कारण मशीनीकरण का कार्य नहीं हो पाता है, फलतः उत्पादन में वृद्वि नहीं हो पाती है । पुनः बढ़ती जनसंख्या के कारण कृषि उत्पादन में वृद्धि के बावजूद भी प्रति व्यक्ति उपलब्धता में वृद्धि नहीं हो पाती है ।
  8. प्राकृतिक विपदा : विश्व के अनेक देशों में प्राकृतिक विपदा (संकट) कायम है। बाढ़, सूखा, भूस्खलन, भूकम्प, ज्वालामुखी इत्यादि ऐसे प्राकृतिक आपदा है जो प्रभावित क्षेत्रों को कृषि विहीन (शून्य) अवस्था में ला देते हैं । विश्व के विकसित देश आपदा से अपनी सुरक्षा अवश्य कर लेते है, या इस तरह के संकट से तुरन्त मुक्ति पा लेते हैं, जबकि विकासशील देशों में इस तरह के संकट, शून्य की स्थिति ला देते हैं ।
  9. सकल घरेलू उत्पाद खर्च : विश्व के विकासशील देशों में सकल घरेलू उत्पाद के अधिकतर भाग का खर्च खाद्य उपलब्धता हेतु होता है, फिर भी प्रति व्यक्ति उपलब्धता कम होती है, क्योंकि प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद कम होते हैं, अतः कुपोषण की गंभीर समस्या देखने को मिलती है । इसके विपरीत विकसित देशों में सकल घरेलू उत्पाद का 10-12% भाग खाद्य उपलब्धता पर खर्च की जाती है, परन्तु फिर भी कैलोरी एवं प्रोटीन की पर्याप्त उपलब्धता होती है ।
  10. व्यवसायिक फसलों की कीमत में भारी वृद्धि : हाल ही के वर्षों में व्यवसायिक फसलों गन्ना, कपास, फल, तिलहन, तम्बाकू, चाय आदि की कीमतों में भारी वृद्धि हुई है । इसके कारण खाद्यान्न उत्पादन में गिरावट आ रही है । अधिक लाभ की आशा में कृषक खाद्यान्न फसलों के स्थान पर व्यवसायिक फसलों के उत्पादन में लगे हुए हैं । इन्हीं सब कारणों से खाद्यान्न फसलों के अन्तर्गत क्षेत्रफल या तो स्थिर हो गया है, या उसमें कमी आती जा रही है ।
  11. आंतंकवादी गतिविधियाँ : वर्त्तमान समय में आंतकवादी गतिविधियों के कारण विश्व के कई राष्ट्रों की कृषि योग्य भूमि बगैर खेती किए ही परती रह जाती हैं । इसके कारण यह क्षेत्र खाद्यान्न उत्पादन से वंचित रह जाते हैं । उदाहरण के लिए : भारत, अफगानिस्तान, पाकिस्तान देशों की कई लाख हेक्टेयर भूमि आंतंकवादी गतिविधियों से प्रभावित रहने के कारण परती पड़ी हुई हैं ।
  12. विकसित देशों की खाद्यान्न राजनीति : विकसित देशों की शोषणवादी एवं अमानवीय नीतियों ने विकासशील देशों के सामने भूखमरी की समस्या की स्थिति उत्पन्न कर दी है। विकसित देश-संयुक्त राज्य . अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया आदि देश आज भी इस स्थिति में हैं कि अपने यहाँ खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि कर अतिरिक्त खाद्यान्नों को विकासशील देशों में सस्ते एवं रियायती मूल्य पर उपलब्ध करा सकते हैं, परन्तु ऐसा नहीं होता है । विकसित देश अपने राजनीतिक स्वार्थ के चलते ऐसा करना तो दूर ‘डंकल प्रस्ताव नीति’ को लागू करते हैं ।

उपर्युक्त सभी परिस्थितियों ने वैश्विक स्तर पर खाद्यान्न फसलों के उत्पादन में कमी ला दी है । जिससे विकासशील देशों में खाद्य व पोषक आहार की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है ।

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